16. तेरे सिवा और क्या देखूं!!

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ख़ामोश हूँ तुझे मेरे यार देख कर,
की धड़कन बढ़ सी जाती है तुझे हर बार देख कर।

सबब मेरी बेचैनी का तुझे कैसे बताऊँ मैं,
कुछ भी अच्छा नही लगता तुझे बीमार देख कर।



ख़बर है की तू महफूज़ है मेरी मोहब्बत के दायरे में,
चुपचाप चले जाएंगे ग़मखार देख कर।।


तूने कहा तू ठीक है तो क्यूं छलक उठी पलकें,
मैं खुद को कैसे संभालूं तेरे आसार देखकर।।


गिरा हुआ मेरी पलकों का झरोखा तब से,
कुछ और क्या देखूं तुझे मेरे यार देख कर।।


चाँद भी झुलस रहा है,इश्क़ का बुखार देख कर,
सितारे पिघल रहे मोहब्बत बेशूमार देख कर।

मैं लम्हात समेट कर अपनी मोहब्बत के बैठी हूँ,
के लोग जल न जाएं मेरे चेहरे का ख़ुमार देख कर।



छुपा लेते हैं अश्क़ों को, हम अपनी मुस्कुराहट में अक़्सर,
की तू बेक़रार न हो जाये मुझको बेक़रार देखकर।।



 

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15. हर मौसम में साथ-साथ..

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सफ़र ज़िन्दगी का कट रहा,
थाम के एक-दूजे का हाथ।
सर्दी-गर्मी-बरसात
हर मौसम साथ-साथ।।


कभी ग़ुलाबी सरदी में,
चादर में छुप के झांकना।
कभी पसीना तर-बतर,
धूप में सुख-दुख बाँटना।।
कभी बारिशें रिमझिम सी,
ले कर आई दिल के जज़बात।
सर्दी-गर्मी..................


कभी ग़मों की आंधी में,
छुप के रोये सारी रात।
कभी खुशी के लम्हों में,
लगे ठहाके और कितनी बात!
आते जाते मौसम में,
साथ बिताए हर हालात।
सर्दी- गर्मी...................


कभी-कभी मै चाँदनी ,
कभी सूरज के जैसा तू।
जब-जब तुझमे बिखरी मैं,
तब-तब मुझमें डूबा तू।
आओ भूल के रंज-ओ-ग़म,
करें एक नई शुरुआत।
सर्दी-गर्मी.....................



कभी मोहब्बत की कसमें,
गवाह सितारों की बारात।
मेरे दिल की धड़कन तू,
और मैं तेरी क़ायनात।
मेरा क़ीमती ज़ेवर तू,
तेरी क़ीमती मैं सौगात।
सर्दी-गर्मी बरसात,
हर मौसम देखा साथ-साथ।।।।।


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14. मैं मोहताज़ नहीं....!

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 मेरे हौसले मोहताज़ नहीं किसी के,
अब मुझे खुद ही उड़ना है।
क्यूँ डरु मैं आँधियों के आने से,
हवाओं का रुख मोड़ के आगे बढ़ना है।


सितारे हों मेरे गर्दिश में,
या हज़ार आँधियाँ आये।
जुटा कर अपनी हिम्मतों को,
एक-एक सीढ़ी चढ़ना है।।



नही कोसना तक़दीर को,
अब तक़दीर खुद बनानी है।
उजाले खुद में समेट कर,
अब अंधेरों से लड़ना है।।


वो दहलीज़ लांघ जाना है,
जहां मेरे दर्द बिकते हैं।
बिछाने दो उन्हें कांटे,
नही अब पीछे मुड़ना है।।


मेरी हिम्मत मेरी ताक़त,
जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होगी।
मुझे अपनी ही पेशानी के,
पसीने से संवरना है।।



कभी कमज़ोर नही थे हम,
ये उनकी ग़लतफ़हमी थी।
दिखाना है ज़माने को,
कुछ ऐसा कर गुज़रना है।।



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13. वो मेरा ही है....????

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जो मेरा है वो मेरा नहीं,
उसने ऐसा कहा नहीं।
वो कहता वो मेरा ही है,
पर मुझको ऐसा लगा नहीं।।

फिक्र मेरी होती है,
कभी-कभी तो उसको भी।
दिल उसका भी बेचैन है,
मेरा दिल बस फ़िदा नहीं।।

छुपा लेता है अपने ग़म,
झूठी हँसी के दायरे में।
मैं उसकी हमराज़ हूँ,
क्या उसको ये पता नहीं!!



जागी तो पहले भी हूँ
सारी- सारी रात मैं।
किसी की तस्वीर देख कर जागूँ,
ऐसा पहले हुआ नहीं।।

जंज़ीरों में बंधी हुई हूँ,
क्यूँ कभी यूँ लगता है।।
ये बंदिशें बेवज़ह मिली,
उसने तो कुछ किया नहीं।।



वो तक़दीर है मेरी,
या नसीब किसी और का।
उसके लिए हूँ बावली,
इसके सिवा कुछ पता नहीं।।

वो हक़ीम है औरों का,
उसे मेरे रोग की क्या ख़बर!
उसके पास सब कुछ है,
बस दर्द-ए-दिल की दवा नहीं।।



दर्द-ए-जुदाई सह कर भी,
उसी के ख़ातिर जीना है।
यही प्यार का तोहफ़ा है,
ये तो कोई सज़ा नहीं।।


वो रहे महफूज़ हमेशा ,
चेहरा उसका खिला रहे।
उसकी खातिर की ना हो,
ऐसी कोई दुआ नहीं।।

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12. परी हूँ मैं..



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मैं नन्ही सी किलकारी,
दुनियां में आने राज़ी थी।
नींद भी ठीक से खुली नही,
अभी-अभी तो जागी थी।।


                                माँ के अंदर पनप रही,
                                सोचा था गोद में खेलूंगी।
                                तुमने मुझसे गोद छीन ली,
                               जैसे माँ भी राज़ी थी????


मेरी नन्ही उंगली पकड़ के,
चलना तो सिखला न सके।
फेंक दिया बेजान समझ के,
सांस तो लेकिन बाक़ी थी।।

                                                   मै ने सोचा परी हूँ मैं,
                                                   तुमने इंसान भी न समझ।
                                                   कैसे कुचल कर चले गए,
                                                  ये कैसी नाराज़गी थी!!?


इतने पत्थर दिल कैसे हो?
ओ समाज़ के ज़िम्मेदारों??
रूह नहीं कॉपी तुम्हारी???
या इंसानियत ना बाक़ी थी?


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11. आ पास आ....

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मेरी हर बात में, बात बस तेरी ही है
आ पास आ , पास बैठ के सुन।।



                             

  कब से टिकी हुई है, तुझ पर मेरी निगाहें
   लब्ज़ों को छोड़ , मेरी ख़ामोशी समेट के सुन।।



मेरे इश्क़ का ग़ुबार तेरे दिल से हो के गुज़रेगा,
आ क़रीब आ मेरे अश्क़ों की चादर लपेट के सुन।।






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10. इंतज़ार है तुम्हारा..

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                                            एक मुद्दत हुई मुस्कुराई नही मैं,
                                            उनको देखे हुए कई दिन गुज़र गए।


नींद भी नही आई ....
दिल को क़रार भी नही आया,
चैन से सोए हुए कई दिन गुज़र गए।।




                                     बिछा रखी है नज़रें दहलीज़ पर
                                     तेरे इंतज़ार में,
                                     पलकों को झपकाए कई दिन गुज़र गए।




ऐसा न हो जाए के सब्र टूट जाए
और बिखर जाऊँ मैं,
अब तो आ जाओ कई दिन गुज़र गए।।


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9. "वो खूबसूरत बचपन..."

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आओ फिर से लौट चलें,
उस खूबसूरत बचपन में।
रंग बिरंगी तितली पकड़ें,
फिर से भींगे सावन में।।


कश्ती कागज़ कि फिर से बना लें,
थाम के डोरी पतंग उड़ा लें।
दौड़ें कटती पतंग के पीछे,
थाम लें उसको दामन में।।
आओ फिर से लौट चलें,
उस खूबसूरत बचपन में.........।


नीम के पेड़ पे डालें झूला,
फिर से चुरायें ग़ुलाब की कली।
लूका-छुपी के खेल सँजोए
झूला झूलें आँगन में।।
आओ फिर से लौट चलें,
उस खूबसूरत बचपन में.........।

नानी की सुने कहानियां,
नाना से पैसे मांग लें।
शादी कराएँ गुड़ियों की,
मन हो न किसी भी उलझन में।।
आओ फिर से लौट चलें,
उस खूबसूरत बचपन में..........।

करें शिकायत सबकी माँ से,
खुश हों थपकी लगवा के।।
दिल मे कोई मैल नहीं,
मज़ा है लेकिन अनबन में।।
आओ फिर से लौट चलें,
उस खूबसूरत बचपन में..........।


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8. कहाँ है बचपन...??

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धुँआ ही धुँआ है जहाँ देखती हूँ
पता ही नही मैं कहाँ देखती हूँ!!
वो गुड़ियों का घर राजा-रानी की शादी
एक गुज़रा हुआ कारवाँ देखती हूँ।।

 
डूब गई कश्तियाँ कागज़ की,
वो खेल खिलौने टूट गए..l
जहां एक प्यारा सा पेड़ था नीम का,
वहाँ कारखानों का धुआँ देखती हूँ।।


बिछड़ गया वो लड़ना झगड़ना,
मज़े लेना शिक़ायत करना

 ज़ुबाँ पे मीठास दिल मे नफ़रत लिए,
भीड़ में हर इंसां देखती हूँ।।


फूल कली मिट्टी और ख़ुशबू,
बाहें फैलाये कर रहे गुहार
नन्ही-नन्ही मासूमियत को,
देते हुए इन्तहां देखती हूँ।।


नानी की कहानियाँ अब नही रही,
न खेत, खलिहान, मैदान रहे 

छीन लिया बचपन चुपके से जिसने
हर जगह मशीनी ज़ुबाँ देखती हूँ।।


वो तुतलाती ज़ुबाँ से कहानी सुनाना,
वो पतंग के पीछे दौड़ के जाना

कुछ न बचा है पहले के जैसा ,
बस क़दमों के निशाँ देखती हूँ।।।




बच्चे बचपन को तरस रहे ,
खो रही उनकी मासूमियत

बारिश की बूंदें रो रही ,
मैं उनका अश्क़-ए-बयाँ देखती हूँ।


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7. कहानियाँ यूँ ही नही बनती..

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कहानियाँ यूँ ही नही बनती
कई अरमान बिखर जाते हैं
अक्सर लोग दिल में उतरकर
 दिल से उतर जाते हैं।।

कभी कभी पिघलती मोम सी
हो जाती है जिंदगी.........
किसी एक दिल के जलने से
कई दिल सँवर जाते हैं।।।

 

जो परिंदे खानाबदोश से
आ गए हों ग़ैर की महफ़िल में
वो फिर वहीं के हो जाते हैं
वो कहाँ अपने घर जाते हैं।।।।
 

कभी कहीं दोस्ती में
किसी को आज़मा मत लेना
दिल में पलने वाले जज़्बात
चुपके से मर जाते हैं।।।।।
 

ले लेते दामन में अपने

छुपा के रखते पलकों में
लेकिन हमको पता नहीं
टूटते तारे किधर जाते हैं।।।

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